(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.183. अध्यायः 183
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भरद्वाजंप्रति भृगुणा शरीरे प्राणापानादीनां कार्यविशेषरूपणम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भरद्वाज उवाच। 12-183-0x(5927)(72350)
पार्थिवं धातुमाश्रित्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत्।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः॥ 12-183-1(72351)
भृगुरुवाच। 12-183-2x(5928)
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन्कीर्तयिष्यामि तेऽनघ।
प्राणिनामनिलो देहान्यथा चेष्टयते बली॥ 12-183-2(72352)
श्रितो मूर्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालयन्।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टने॥ 12-183-3(72353)
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः।
मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि विषयाश्च सः॥ 12-183-4(72354)
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते।
कोष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः॥ 12-183-5(72355)
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः।
वहन्मूत्रं पुरीषं चाप्यपानः परिवर्तते॥ 12-183-6(72356)
प्रयत्ने कर्मणि बले य एकस्त्रिषु वर्तते।
उदान इति तं प्राहुरध्यात्मकुशला जनाः॥ 12-183-7(72357)
संधिष्वपि च सर्वेषु सन्निविष्टस्तथाऽनिलः।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते॥ 12-183-8(72358)
धातुष्वग्निस्तु विततः समानोऽग्निः समीरितः।
रसान्धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नवतिष्ठते॥ 12-183-9(72359)
अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः।
समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः॥ 12-183-10(72360)
आस्यं हि पायुसंयुक्तमन्ते स्याद्गुदसंज्ञितम्।
स्रोतस्तस्मात्प्रजायन्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम्॥ 12-183-11(72361)
प्राणानां सन्निपाताच्च सन्निपातः प्रजायते।
ऊष्मा सोग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम्॥ 12-183-12(72362)
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम्॥ 12-183-13(72363)
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्या ऊर्ध्वमामाशयः स्मृतः।
नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाः समाश्रिताः॥ 12-183-14(72364)
प्रसृता हृदयात्सर्वास्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।
वहन्त्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः॥ 12-183-15(72365)
एष मार्गोऽथ योगानां येन गच्छन्ति तत्पदम्।
जितक्लमासना धीरा सूर्धन्यात्मानमादधन्॥ 12-183-16(72366)
एवं सर्वेषु विहितः प्राणापानेषु देहिनाम्।
तस्मिन्योऽवस्थितो नित्यमग्निः स्थाल्यामिवाहितः। ॥ 12-183-17(72367)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 183॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-183-5 पृष्ठतस्तु समानेनेति ट. थ. पाठः॥ 12-183-10 समन्वितः समानेनेति ट. ड. थ. पाठः॥ 12-183-11 पायुपर्यन्तमिति झ. पाठः॥ 12-183-15 हृदयात्सर्वे इति झ. ट. पाठः॥ 12-183-16 एष मार्गोऽथ युक्तानामिति ट. पाठः॥ 12-183-17 तस्मिन्समिध्यते नित्यमिति घ. झ. पाठः। यो व्यज्यत इति ट. पाठः॥


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